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मन को वश में कैसे करें।

कीचड़ – रहित तालाब की शोभा है, दुर्जन रहित – सभा की शोभा है; कठोर वर्ण – रहित काव्य की शोभा है और विषय – वासना रहित मन की शोभा है।

दरअसल सारा दारोमदार मन को वश में करने में ही है और मन को वश में करने में विषयों का ध्यान ही बाधा है।

विषयो का ध्यान करने वाले मनुष्य के मन में पहले विषयों से प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति से इच्छा, इच्छा से क्रोध और क्रोध से भ्रम पैदा होते हैं।

भ्रम से स्मृति नष्ट होती है, स्मृति नष्ट हो जाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट हो जाने से मनुष्य ही नष्ट हो जाता है।

कहने का तात्पर्य यह है की मनुष्य विषयो का ध्यान ही न करे तो यह घटना क्रम ही न घटे।

विषयों का ध्यान मन से होता है और मन में ध्यान के बाद इन्द्रियां अपना काम करती हैं, अगर मन वश में हो तो इन्द्रियां कुछ कर ही नही सकेंगी।

गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि मन सारथी है और इन्द्रियां घोड़े हैं। जैसे सारथी जिधर चाहता है उधर ही घोड़े जाते हैं। वैसे ही मन जिधर चाहता है उधर ही इन्द्रियां जाती हैं।

यानि मन वश में हो तो इन्द्रियां भी वश में हो जाती हैं। जिनका मन वश में नही, वह मन से भातिं भातिं के विषयों का ध्यान करता हुआ नष्ट हो जाता है।

जिस मन में विषय – वासना नही, वही मन शुद्ध है; उसी मन की शोभा है। मन केवल ज्ञान या वैराग्य से वश में होता है।

जब मनुष्य को संसार की असारता का ज्ञान हो जाता है तब उसको वैराग्य होता है यानि संसार से विरक्ति हो जाती है और फ़ौरन उसका मन वश में आ जाता है।

संत कबीर ने कहा है –

मन के मते न चलिये, मन का मता अनेक ।

जो मन पर असवार है, ते साधु कोई एक।।

मन – पंछी जब लग उड़े, विषय वासना माहिं।

ज्ञान बाज की झपट में, तब लग आया नाहिं।।

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